Old Pension Scheme Update: देश के करोड़ों सरकारी कर्मचारियों के लिए साल 2026 एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। Old Pension Scheme यानी पुरानी पेंशन योजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने एक बार फिर से इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। वर्ष 2004 में नई पेंशन योजना (NPS) लागू होने के बाद से ही कर्मचारी संगठन लगातार पुरानी पेंशन प्रणाली की बहाली की मांग करते आ रहे हैं। अब जब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है, तो लाखों कर्मचारियों को नई उम्मीद जगी है।
पुरानी पेंशन योजना के समर्थकों का मानना है कि रिटायरमेंट के बाद निश्चित पेंशन पाना उनका मौलिक अधिकार है। वहीं सरकार का कहना है कि बढ़ती पेंशन देनदारियों से राजकोषीय संतुलन बिगड़ सकता है। इस बीच कुछ राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर Old Pension Scheme को फिर से लागू करने की घोषणा की है, जिससे यह बहस और भी गरमा गई है। आइए जानते हैं कि इस पूरे मामले में क्या है और 2026 में क्या बदलाव संभव हैं।
Old Pension Scheme और New Pension Scheme में क्या है अंतर
पुरानी पेंशन योजना (OPS) में सरकारी कर्मचारियों को उनके अंतिम वेतन के आधार पर निश्चित पेंशन मिलती थी, जो हर साल महंगाई भत्ते के अनुसार बढ़ती रहती थी। इस योजना में कर्मचारी को अपने वेतन से कोई कटौती नहीं करनी पड़ती थी और पूरी पेंशन की जिम्मेदारी सरकार की होती थी। इसके अलावा, कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार को पारिवारिक पेंशन मिलती थी और ग्रेच्युटी भी अलग से दी जाती थी। यह प्रणाली कर्मचारियों को पूर्ण वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती थी।
नई पेंशन योजना (NPS) में कर्मचारी की सैलरी से 10 प्रतिशत और सरकार की ओर से 14 प्रतिशत योगदान एक पेंशन फंड में जमा होता है। यह राशि शेयर बाजार और अन्य निवेश साधनों में लगाई जाती है। रिटायरमेंट के समय जो राशि जमा होती है, उसका 60 प्रतिशत एकमुश्त मिलता है और बाकी 40 प्रतिशत से एन्युटी खरीदनी पड़ती है, जिससे मासिक पेंशन मिलती है। चूंकि यह बाजार आधारित योजना है, इसलिए इसमें जोखिम भी शामिल है और पेंशन की राशि निश्चित नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट में क्या चल रही है सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न कर्मचारी संगठनों और राज्य सरकारों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। इन याचिकाओं में मुख्य रूप से यह मांग की गई है कि पेंशन को केवल सरकारी नीति नहीं बल्कि कर्मचारियों का संवैधानिक अधिकार माना जाए। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि जीवनभर सेवा देने के बाद सम्मानजनक और सुरक्षित पेंशन पाना उनका मूल अधिकार है। यदि अदालत इस तर्क को स्वीकार करती है, तो पेंशन नीति में बड़ा बदलाव हो सकता है।
केंद्र सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि पुरानी पेंशन योजना से सरकार पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। सरकार के अनुसार, यदि सभी कर्मचारियों को OPS दी जाती है, तो आने वाले वर्षों में पेंशन देनदारियां राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खा जाएंगी। हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी हैं और माना है कि यह मामला गंभीर विचार का विषय है। अगले कुछ महीनों में अदालत की टिप्पणी या निर्देश पूरे पेंशन विवाद की दिशा तय कर सकते हैं।
राज्य सरकारों ने क्या किया है फैसला
केंद्र सरकार के NPS पर अड़े रहने के बावजूद, कई राज्य सरकारों ने अपने कर्मचारियों के लिए Old Pension Scheme को फिर से लागू करने का फैसला लिया है। राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की घोषणा की है। इन राज्यों का मानना है कि कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। इन राज्यों के फैसले ने अन्य राज्यों में भी कर्मचारियों की मांग को मजबूती दी है।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सरकारों का यह कदम राजनीतिक फायदे के लिए भी हो सकता है। उनका तर्क है कि पुरानी पेंशन योजना से राज्यों पर दीर्घकालिक वित्तीय दबाव बढ़ेगा। फिर भी, जिन राज्यों ने OPS बहाल की है, वहां के कर्मचारियों में खुशी की लहर है। केंद्र सरकार इन राज्यों के फैसले से खुश नहीं है और उसने चेतावनी दी है कि इससे राजकोषीय अनुशासन प्रभावित हो सकता है।
NPS में सुधार की संभावना
केंद्र सरकार ने साफ किया है कि वह पुरानी पेंशन योजना को वापस लाने के पक्ष में नहीं है, लेकिन NPS में सुधार पर विचार किया जा रहा है। सरकार के सूत्रों के अनुसार, एक संभावित विकल्प यह हो सकता है कि NPS में न्यूनतम गारंटीड पेंशन का प्रावधान जोड़ा जाए। इससे कर्मचारियों को एक तय राशि की गारंटी मिल सकेगी और साथ ही बाजार आधारित रिटर्न का लाभ भी मिलेगा। इस तरह का हाइब्रिड मॉडल दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य हो सकता है।
वित्त मंत्रालय और पेंशन विभाग इस दिशा में काम कर रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, सरकार NPS में योगदान की दर बढ़ा सकती है और साथ ही कर लाभ भी बढ़ाया जा सकता है। एक अन्य प्रस्ताव यह भी है कि रिटायरमेंट के समय एन्युटी खरीदने की अनिवार्यता को 40 प्रतिशत से घटाकर 25-30 प्रतिशत किया जाए, ताकि कर्मचारियों को अधिक एकमुश्त राशि मिल सके। ये सभी विकल्प विचाराधीन हैं और 2026 के बजट सत्र में इस पर कोई घोषणा हो सकती है।
कर्मचारियों की मांग और आंदोलन
देशभर में सरकारी कर्मचारी संगठन लगातार Old Pension Scheme की बहाली के लिए आंदोलन कर रहे हैं। विभिन्न संगठनों ने धरना-प्रदर्शन, रैलियां और हड़तालों का आयोजन किया है। कर्मचारियों का कहना है कि NPS में उन्हें वह सुरक्षा नहीं मिलती जो OPS में थी। बाजार के उतार-चढ़ाव से उनकी मेहनत की कमाई खतरे में पड़ सकती है। वे चाहते हैं कि सरकार उनकी दशकों की सेवा का सम्मान करे और उन्हें गरिमापूर्ण रिटायरमेंट की गारंटी दे।
कई कर्मचारी नेताओं ने कहा है कि यदि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देती, तो वे अपना आंदोलन और तेज करेंगे। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि चुनावों में वे ऐसी पार्टियों को वोट देंगे जो OPS की बहाली का वादा करें। इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है और विपक्षी दल सरकार पर दबाव बना रहे हैं। 2026 में होने वाली राजनीतिक घटनाओं में यह मुद्दा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
2026 में क्या हो सकता है अंतिम फैसला
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 में पेंशन मुद्दे पर कोई ठोस निर्णय हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, बजट सत्र में संभावित घोषणाएं और राज्यों के फैसलों के प्रभाव को देखते हुए, केंद्र सरकार को कोई न कोई रास्ता निकालना होगा। यदि अदालत पेंशन को अधिकार मानती है, तो सरकार को अपनी नीति बदलनी पड़ सकती है। वहीं, यदि NPS में गारंटी जोड़ी जाती है, तो यह एक मध्यम मार्ग हो सकता है।
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पूरी तरह से OPS वापस लाना व्यावहारिक नहीं होगा क्योंकि इससे सरकारी खर्च में भारी वृद्धि होगी। उनका सुझाव है कि एक संतुलित हाइब्रिड मॉडल ही टिकाऊ समाधान हो सकता है। दूसरी ओर, कर्मचारी संगठन किसी भी समझौते को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखते और पूर्ण OPS की मांग पर अड़े हुए हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि अंतिम निर्णय किस दिशा में जाता है।
Disclaimer: यह लेख सामान्य जानकारी और विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार किया गया है। Old Pension Scheme से संबंधित किसी भी आधिकारिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित सरकारी विभाग, पेंशन मंत्रालय की आधिकारिक अधिसूचना या सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ही प्रामाणिक स्रोत मानें। किसी भी वित्तीय या कानूनी निर्णय लेने से पहले विशेषज्ञ सलाह अवश्य लें और आधिकारिक पुष्टि करें।





